फैमिली डॉक्टर के बदले बनाए फैमिली फार्मर,न बीमारी की डर न दवाई की खर्चा।

BY: TRACKCG EDITOR
17-OCT-2021 ,SUNDAY (A MONTH AGO)

????रासायनिक खाद ने जल जंगल और जमीन को कर दिया बर्बाद

????प्रयास समाज सेवी संगठन ने लोगों से कि अपील


संवाददाता पुष्पराज मराठा

प्रयास समाज सेवी संगठन ने लोगों से कम से कम जहर का उपयोग दैनिक दिनचर्या में करने की अपील की है।
प्रयास समाज सेवी संगठन के संस्थापक अध्यक्ष किशोर राजपूत ने कहा कि दिवाली का पर्व नजदीक आने के साथ ही पटाखों के पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पर बहस फिर से आरंभ हो गई है। कई राज्यों में पटाखों पर पाबंदी लगाई जा रही है। यह कार्रवाई किस सीमा तक सही है, इस पर अलग-अलग मत हैं। एक वर्ग ऐसा भी है जो पटाखों पर पूर्ण पाबंदी को अपने पर्व बनाने के अधिकार का हनन मानता है। उचित होगा कि हम चर्चा पटाखे के बजाए पर्यावरण पर केंद्रित करें। यदि प्रदूषण के व्यापक विषय को गहराई से देखें तो पटाखा इसका एक मौसमी कारण है। विकास के नाम पर कई ऐसे चलन प्रचलन में हैं जिनका पर्यावरण पर अत्यंत घातक प्रभाव पड़ रहा है।

किशोर राजपूत ने कहा कि रासायनिक खेती इनमें प्रमुख है। अधिक उत्पादन पाने और लाभ कमाने की मृग-मरीचिका के कारण हमारे खेतों में दशकों से जारी रासायनिक उवरकों- कीटनाशकों के अत्यधिक या कहें कि अंधाधुंध प्रयोग से दिन -प्रतिदिन प्राकृतिक परिवेश में रसायनों की मात्रा बढ़ रही है। खेती में कई ऐसे घातक कीटनाशक प्रयोग किए जा रहे हैं जो विष से कम नहीं हैं। यही कारण है कि हमारे खाद्य पदार्थ जहरीले होते जा रहे हैं।

हमारे शरीर में खाने के साथ ही बड़ी मात्रा में कीटनाशक दवाइयों का अंश जहर के रूप में जा रहा है। ये जहरीले रसायन हमारे शरीर में जाकर कोशिकाओं में धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं और फिर कैंसर, शुगर और हाइपरटेंशन जैसी खतरनाक बीमारियों को जन्म देते हैं।

उन्होंने बताया कि यह रासायनिक जहर फल और सब्जियों में सबसे अधिक पाया जाता है। दुधारू पशु भी इसके दुष्प्रभाव के शिकार हो चुके हैं। उनके चारे में भी जहरीले रसायनों के प्रयोग से इनसे प्राप्त होने वाला दूध भी अब सुरक्षित नहीं है। 2017-18 में देश भर की 27 प्रयोगशालाओं में सब्जी, फल, मसाले, चावल गेहूं, दालें, दूध, मांस, मछली आदि के 23660 नमूनों की जांच की गई। इसमें लगभग 19 प्रतिशत नमूनों में खतरनाक रसायनों के अंश पाए गए।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की वैज्ञानिक रसोई में जा रहे जहर के लिए किसानों को ही जिम्मेवार मानती हैं। उनकी बात काफी हद तक सही है क्योंकि किसानों के हाथों से ही हमारे खेतों में रासायनिक जहर डाला जाता है जो अंततः हमारे शरीर में भी पहुंचता है और उसे बीमार बनाता है,लेकिन वे नीति-नियंता और वैज्ञानिक भी अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से नहीं बच सकते जिन्होंने किसानों के मन में यह बात बिठा दी कि यदि खेती को लाभकारी बनाना है तो रासायनिक खाद-उर्वरक का प्रयोग करना ही होगा।

*प्राकृतिक खेती ही स्वास्थ्य के लिए बेहतर*

किशोर ने कहा कि अब यह बात साबित हो चुकी है कि रासायनिक कृषि के परिणाम से न केवल उपज जहरीली हुई है, बल्कि आसपास का जल, वायु और जमीन भी प्रदूषण के शिकार हो चुके हैं। परंतु देश में किसानों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी तैयार हो चुका है जो अपनी मिट्टी और उपभोक्ता के सेहत की चिंता भी करता है और प्राकृतिक कृषि के द्वारा अपने खेत से मिलने वाली उपज विषमुक्त हो, इसके लिए संकल्पित है। प्राकृतिक कृषि में फसल के पोषण और कीटनियंत्रण के लिए किसी प्रकार का कोई रसायन प्रयोग नहीं किया जाता। इस विधि में देशी गाय के गोबर, गोमूत्र आदि का ही प्रयोग किया जाता है और इनसे निर्मित जीवामृत जैसे द्रव्यों के प्रयोग से खेत की मिट्टी में करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु कार्य करने लगते हैं और इससे तैयार फसल रोगमुक्त तो होती ही है, स्वास्थ्यवर्धक भी होती है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक कृषक देशी बीजों का प्रयोग करते हैं। इन बीजों से प्राप्त उपज में प्रकृति द्वारा निर्धारित अनुपात में पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो हमारे शरीर को रोगमुक्त, पुष्ट और बलवान बनाते हैं।
*प्रकृति का सहचर्य कोरोना ने समझाया*

कोरोना ने हमें समझा दिया है कि प्रकृति का साहचर्य ही स्वस्थ जीवन प्रदान कर सकता है। प्रयोगशालाओं में तैयार बीज, खाद और कीटनाशकों द्वारा उपजाए गए खाद्य पदार्थों का उपयोग यदि हमने जारी रखा, तो वे हमारे शरीर को भी चलती-फिरती प्रयोगशाला बना देंगे। यह वर्तमान में होता नजर भी आ रहा है। यदि कोरोना और ऐसी अन्य बीमारियों से बचाव का सर्वोत्तम उपाय इम्युनिटी बढ़ाना ही है, तो रासायनिक खेती से तैयार भोजन तो इसमें मददगार नहीं बन सकते।


*प्रयास समाज सेवी संगठन ने की अपील*
प्रयास समाज सेवी संगठन के संस्थापक अध्यक्ष किशोर राजपूत ने सभी लोगों से अपील करते हुए आग्रह किया है कि अब समय आ गया कि अपने आसपास मौजूद किसी प्राकृतिक कृषक को खोजें और उसे अपना फैमिली फार्मर बनाएं। ऐसा करने पर आपको संभवतः फैमिली डॉक्टर की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्राकृतिक खेती के द्वारा उपजाए खाद्य पदार्थो से ही स्वस्थ और सबल भारत का निर्माण संभव है। यह बात हमें खुद समझने के साथ-साथ अधिकाधिक लोगों को समझानी होगी।


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