दशहरा के पावन पर्व पर हुआ नीलकंठ पक्षी का दर्शन।

BY: TRACKCG EDITOR
16-OCT-2021 ,SATURDAY (A MONTH AGO)

भारतीय संस्कृति में दशहरा के दिन नीलकंठ का दर्शन शुभ माना जाता है, मगर कोई विरले ही दर्शन कर पाता हैं।


संवाददाता पुष्पराज मराठा

दशहरा के पावन अवसर पर शमी वृक्ष और अपराजिता पुष्प और सफेद पलास वृक्ष के पूजा करने मंदिर जाते हुए रास्ते में किशोर राजपूत को नीलकंठ के दर्शन हुआ।

किशोर राजपूत ने बताया कि शास्त्रों में नीलकंठ को महादेव का मंगलकारी एवं शांत मूर्त के अंतर्गत एक सौम्य स्वरूप माना जाता है। इस सौम्य स्वरूप के विषय में श्रीमद्भागवत के आठवें अध्याय में एक कथा आई है जिसके अनुसार समुद्र मंथन के समय समुद्र से ‘हलाहल’ नामक विष निकला। उस समय सभी देवों की प्रार्थना तथा पार्वती जी के निवेदन से शिवजी ने हलाहल विष का पान कर लिया और उस हलाहल विष को उन्होंने कंठ में ही रोक लिया था जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा।

श्रीमद्भागवत के चौथे अध्याय में- ‘*तत्पहेमनिकायाभं शितिकण्ठं त्रिलोचनम्’* कहकर भगवान शिव के नीलकंठ वाले सौम्य रूप का वर्णन किया गया है।

वर्तमान समय में नीलकंठ नामक पक्षी को भगवान शिव (नीलकंठ) का प्रतीक माना जाता है। उड़ते हुए नीलकंठ पक्षी का दर्शन करना सौभाग्य का सूचक माना जाता है।

‘खगोपनिषद्’ के ग्यारहवें अध्याय के अनुसार नीलकंठ साक्षात् शिव का स्वरूप है तथा वह शुभ-अशुभ का द्योतक भी है।

*भगवान श्री रामचंद्र से जुड़ी हैं नीलकंठ का यह रहस्य*

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने के बाद ही लंका पति रावण पर विजय प्राप्त की थी. इसलिए विजय दशमी का पर्व जीत का पर्व माना गया है. दशहरे पर्व पर नीलकण्ठ पक्षी के दर्शन की परंपरा बरसों पुरानी है. श्री लंका को जीतने के बाद जब भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को ब्राह्मण हत्या का पाप लगा था. तब भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण के साथ मिलकर भगवान शिव की पूजा अर्चना की एवं ब्राह्मण हत्या के पाप से खुद को मुक्त कराया.यह शास्त्रों में वर्णित है।


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